क्या संयुक्त राष्ट्र संघ आधुनिक वैश्विक चुनौतियों से निपटने में प्रभावी है?
Mehraदेखिए, संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका को समझने के लिए हमें उसके कामों को देखना होगा। जब विश्व में कहीं युद्ध होता है, तो सबसे पहले जो संगठन वहाँ मध्यस्थता करने के लिए आगे आता है, वह है संयुक्त राष्ट्र। आपको याद होगा, 2015 में इराक और सीरिया में ISIS के खिलाफ जब अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत थी, तो संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया के देशों को एक साथ लाकर उस संकट का सामना करने में मदद की।
और फिर आता है जलवायु परिवर्तन। पेरिस समझौता क्या है? यह तो संयुक्त राष्ट्र की ही पहल थी, जिसमें दुनिया के देशों ने ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए एक साथ कदम बढ़ाए। ये तो साफ है कि अगर संयुक्त राष्ट्र न होता, तो ऐसा वैश्विक सहयोग संभव ही नहीं हो पाता।
आज की दुनिया में आर्थिक असमानता, शरणार्थी संकट, और साइबर हमले जैसी चुनौतियाँ बढ़ रही हैं। लेकिन यह भी सच है कि संयुक्त राष्ट्र ने इन समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए नई-नई योजनाएं और नीतियां बनाई हैं। उदाहरण के लिए, UNHCR ने दुनिया भर के शरणार्थियों को घर और खाने की व्यवस्था करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हाँ, संयुक्त राष्ट्र की गति कभी-कभी धीमी लगती है, लेकिन यह इसलिए कि यह एक वैश्विक संगठन है, जहाँ 193 देश अपने-अपने हितों के साथ आते हैं। फिर भी, यह संगठन दुनिया को एक साथ रखने का काम करता है। इसलिए मेरा कहना है कि संयुक्त राष्ट्र संघ आधुनिक वैश्विक चुनौतियों से निपटने में प्रभावी है।
Palkarमैं आपकी बात समझती हूं, लेकिन क्या वाकई संयुक्त राष्ट्र उतना प्रभावी है जितना दिखता है? यूक्रेन युद्ध को ही ले लीजिए - संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद लगातार बैठ रही है, लेकिन क्या वो युद्ध रुक पाया? नहीं। वीटो पावर के कारण संगठन लकवाग्रस्त सा हो जाता है।
और जलवायु परिवर्तन की बात करें तो पेरिस समझौता तो हुआ, लेकिन उसके लक्ष्यों को पूरा करने में हम कितना सफल हुए? अमेरिका समझौते से अलग हुआ, चीन और भारत कोयले का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं। कागजों पर तो सब कुछ अच्छा लगता है, पर जमीनी हकीकत कुछ और ही कहती है।
शरणार्थी संकट का उदाहरण आपने दिया - क्या UNHCR वाकई समस्या का समाधान कर पा रहा है? या सिर्फ लक्षणों का इलाज कर रहा है? मूल कारणों से तो संगठन दूर भाग रहा है।
संयुक्त राष्ट्र एक ऐसी कार की तरह है जिसमें 193 ड्राइवर बैठे हैं और हर कोई अलग दिशा में स्टीयरिंग घुमा रहा है। परिणाम साफ है - गंतव्य तक पहुँचने में लगातार विफलता।
Mehraआपके बिंदुओं को सुनकर मैं समझता हूँ कि आपकी चिंता कहाँ है, लेकिन यहाँ पर एक महत्वपूर्ण बात है - संयुक्त राष्ट्र की सफलता को मापने के लिए हमें उसके प्रयासों को देखना होगा, न कि सिर्फ अंतिम परिणामों को।
जी हाँ, यूक्रेन युद्ध जारी है, और वीटो पावर की वजह से कुछ निर्णय लेने में देर होती है। लेकिन क्या आपने ध्यान दिया है कि संयुक्त राष्ट्र ने इस युद्ध के दौरान कितने शरणार्थियों की मदद की है? UNHCR ने लाखों लोगों को घर, भोजन और चिकित्सा सहायता प्रदान की है। यह तो एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है, भले ही युद्ध अभी तक खत्म नहीं हुआ हो।
जलवायु परिवर्तन की बात करें तो हाँ, अमेरिका ने एक बार समझौते से अलग होकर वापस जुड़ने में देर की थी। लेकिन फिर भी, पेरिस समझौते ने दुनिया को एक मंच पर लाया है। चीन और भारत कोयले का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन वे भी अपने लक्ष्यों को पूरा करने के लिए धीरे-धीरे सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं। यह सब संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों का ही परिणाम है।
और जब बात आती है कि 193 देश अलग-अलग दिशा में स्टीयरिंग घुमा रहे हैं, तो हाँ, यह सच है। लेकिन यही तो संयुक्त राष्ट्र की खूबी है कि वह इन सबके बीच भी एक सामान्य जमीन तलाशने की कोशिश करता है। यह आसान नहीं है, लेकिन यह जरूरी है।
इसलिए मेरा कहना है कि संयुक्त राष्ट्र की गति और तरीके शायद धीमे हैं, लेकिन यह संगठन आधुनिक वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में प्रभावी है। यह एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो दुनिया को एक साथ लाता है, और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
Palkarआप जिस "सामान्य जमीन" की बात कर रहे हैं, वह वास्तव में कमजोर देशों के हितों की बलि चढ़ाने जैसा है। क्या आपने कभी सोचा है कि जब पाँच देश वीटो पावर का इस्तेमाल करके अपनी मनमानी कर सकते हैं, तो यह वैश्विक लोकतंत्र कहाँ रह गया?
UNHCR की मदद तो अच्छी है, पर क्या यह समस्या का स्थायी समाधान है? शरणार्थी तो बन ही रहे हैं, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र युद्ध रोक नहीं पाता। यह ऐसा हुआ जैसे आग लगने पर आप बाल्टी भर-भरकर पानी डालें, लेकिन आग लगाने वाले को रोकने की कोशिश ही न करें।
और जलवायु परिवर्तन की बात करें तो पेरिस समझौता एक अच्छी शुरुआत थी, पर उसके लक्ष्य पूरे नहीं हो रहे। संयुक्त राष्ट्र देशों को बाध्य नहीं कर सकता, सिर्फ अनुरोध कर सकता है। जब तक कोई कानूनी बाध्यता नहीं होगी, तब तक यह सब दिखावा ही रहेगा।
Mehraआपकी बात में कुछ हद तक सच्चाई है, लेकिन मैं यहाँ पर संयुक्त राष्ट्र की वास्तविक भूमिका को समझाना चाहूँगा। जी हाँ, वीटो पावर एक बड़ी समस्या है, और हाँ, यह वैश्विक लोकतंत्र के विचार को चुनौती देता है। लेकिन यह भी सच है कि अगर यह वीटो पावर नहीं होती, तो शायद संयुक्त राष्ट्र कभी भी बना ही नहीं पाता। यह एक ऐसा समझौता है जो दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों को इस संगठन में बाँधे रखता है।
अब आते हैं शरणार्थी संकट पर। जी हाँ, UNHCR का काम आग बुझाने जैसा है, लेकिन यह आग बुझाने का काम भी तभी संभव है जब एक वैश्विक संगठन हो। यदि संयुक्त राष्ट्र न होता, तो शरणार्थियों की मदद के लिए तो कोई भी वैश्विक पहल न होती। यह संगठन कम से कम उन लोगों की ज़िंदगी बचाता है, जिनकी ज़िंदगी खतरे में होती है। और यह तो स्पष्ट है कि युद्ध रोकने के लिए भी संयुक्त राष्ट्र को देशों का सहयोग चाहिए। अगर देश खुद युद्ध छेड़ना चाहें, तो संयुक्त राष्ट्र अकेला युद्ध नहीं रोक सकता।
जलवायु परिवर्तन की बात करें तो आपका कहना सही है कि पेरिस समझौते के लक्ष्य पूरे नहीं हो रहे हैं। लेकिन यह भी सच है कि बिना संयुक्त राष्ट्र के दुनिया भर के देश कभी इस विषय पर एक साथ बैठकर बात भी नहीं कर पाते। यह संगठन देशों को एक मंच पर लाता है, और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। देशों को बाध्य करना आसान नहीं है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र उन्हें जिम्मेदारी महसूस कराने का काम करता है।
इसलिए, मेरा कहना है कि संयुक्त राष्ट्र आज भी आधुनिक वैश्विक चुनौतियों से निपटने में प्रभावी है। यह एक प्लेटफॉर्म है जो दुनिया को एक साथ रखता है, और इसके बिना तो वैश्विक समस्याओं का समाधान और भी दूर चला जाता।
Palkarआपका तर्क मुझे एक डॉक्टर की याद दिलाता है जो बीमारी का इलाज नहीं कर पा रहा, सिर्फ लक्षणों पर पट्टी बाँध रहा है। वीटो पावर को जायज ठहराने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन क्या यह सही है कि दुनिया के भाग्य का फैसला सिर्फ पाँच देश करें?
आप कह रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र के बिना कोई वैश्विक पहल नहीं होती, पर क्या आपने कभी सोचा कि इसी वीटो सिस्टम ने कितने युद्धों को रोकने से रोक दिया? सीरिया में लाखों लोग मारे गए, और संयुक्त राष्ट्र क्या कर पाया? सिर्फ बयानबाजी!
और जलवायु परिवर्तन के मामले में - एक मंच पर बैठकर बात करना और कुछ हासिल करना दो अलग बातें हैं। क्या आप जानते हैं कि पेरिस समझौते के बाद से वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में वृद्धि ही हुई है? यह तो वैसा ही हुआ जैसे कोई सम्मेलन करके मोटापा कम करने की बात करे, लेकिन असल में बर्गर खाता रहे।
मेरी बात सीधी है - जब तक संयुक्त राष्ट्र में वास्तविक सुधार नहीं होते, विशेषकर वीटो पावर में, तब तक यह संगठन वैश्विक चुनौतियों से निपटने में प्रभावी नहीं हो सकता।